ऋषि दुर्वासा का शाप और शिवजी का ब्याह

हिमालय पुत्री गौरी बचपन से ही शिवजी की छोटी सी मूर्ति से दिल लगा बैठी थी। वह उन्हें नहलाती धुलाती नए वस्त्र पहनाती और साथ सुलाती। रोजाना पूजा उजमन करती कोई सखी उससे पूछती -गौरी, ये कौन हैं? तो गौरी कहती – ये मेरे पति परमेश्वर हैं इन्ही से मेरा संसार है। गौरी उन्ही के जप तप व्रत में लगी रहती।
देवगणों ने सती के भस्म होने के बाद शिवजी को कई बार मनाया की दुबारा शादी करलें पर शिव न माने। जब देवगणों को गौरी के जप तप के बारे पता चला तो बहुत खुश हुए वह शिवजी को मनाने लगे। शिव ने भी जब गौरी की भक्ति देखी तो उनका मन पिघल गया और वह पुनर्विवाह को मान गए।
हिमालायराज और मैना देवी को खबर भेजी गयी। भूत पिशाच देव दानव नर साधु पशु पक्षी कीड़े मकोड़े भी शिवजी की बारात में शामिल होने चल पड़े। शिवजी भभूति लपेटे नागों की माला पेहेन नंदी बैल पर सवार हो गए । ऋषि दुर्वासा भी अपनी माता अनुसूया संग विवाह में आये। उन्हें देख देवता डरे की ये तो बहुत गुस्से वाले हैं पल में शाप दे देते हैं। पर दुर्वासा डर भांप कर बोले – डरो नहीं , मैंने अपनी माता को वचन दिया है गुस्सा नही होऊंगा और शाप नहीं दूंगा। देवगण इससे खुश हुए सब नाचते गाते शिवजी की बारात को चल पड़े। नाचते नाचते शिवगण मस्ती में आ गये दुर्वासा ऋषि को छेड़ बैठे जिस ऋषि ने अपना अपमान समझा और गुस्से में आके शाप दे दिया – मुरखो! तुम्हारे इस रूप को देख वधु पक्ष वाले डर जाये और शिव का इस रूप में कभी विवाह न होगा !
बारात रुक गयी अरे ये क्या हुआ दुर्वासा ऋषि ने शाप दे दिया अब विवाह कैसे होगा ! ऋषि का गुस्सा शांत हुआ तो वह दुखी हुए -ओह मैंने तो वचन दिया था शाप क्यों दे दिया ! नारायण ने सब देखा तो बोले – ऋषिवर आप चिंतित न हों जो होता हूं विधि का विधान होता है। विवाह पूर्ण होगा और जरूर होगा। बारात फिर भांग धतूरे पी हँसी ख़ुशी से नाचते गाते हिमालय राज के द्वार पहुची।
द्वार पर गौरी की माता मैना देवी और उसकी सखियाँ खड़ी थी। भूतो पिशाचों के बीच शिव जी को बैल पर देख वे भयभीत हो गईं। हे प्रभु ! ये नाग और भभूति लपेटे मेरी बेटी को ब्याहने आया है ! मरती मर जाउंगी पर गौरी का विवाह इस गवार से नहीं करुँगी – मैना रोती हुई बोली। गौरी ने समझाया – माता यही अब मेरे प्राणप्रिय हैं। ये जगत के पालनहार त्रिपुरारी कंसारी है और ये मुझे तन मन से स्वीकार हैं। शोक न करें और आरती की तैयारी करें।
मैना देवी बुझे मन से द्वार पर आरती की थाल लिए खड़ी हो जाती हैं। शिव जी द्वारे पर पहुचते है मैना देवी आरती करती हैं। देवगण कहते हैं- भोलेनाथ थाली में शगुन डाल दें। शिव जी जो संसारी नियमों से अंजान है पूछते हैं – शगुन क्या होता है !
तो गौरी की सखियाँ कहती है जो चीज़ आपको प्रिय हो वह थाली में रख दें। शिवजी ये सुन गले से नाग उतार कर थाली में रख देते है । ये देखते ही मैना देवी चिल्ला कर बेहोश हो जाती हैं। और सखियाँ इधर उधर भाग जाती हैं। शिवजी नारायण और शिव गण विवाह स्थल की ऒर चले जाते हैं।
होश आने पर मैना देवी हिमालय राज से रोकर कहती हैं – कैसा दूल्हा चुना है आपने ! ये तो जंगल का वासी गवार भांग के नशे में रहने वाला है इसके साथ मेरी पुत्री कैसे रहेगी । तो हिमालय राज हँसते है कहते है – अरे पगली ये देवों के देव महादेव हैं जंगल नहीं पूरा संसार में इनका वास है। हमारी पुत्री भाग्यवान है तू दुःख मनाती है !
पर मैंना देवी नहीं मानती । ये सब देख नारायण युक्ति निकालते हैं । वह शिवजी को शनील और मखमल के कपड़ों से सजाते हैं। रत्नों की और फूलों की माला पहनाते हैं। सर पर चंद्रमा का मुकुट सुशोभित करते हैं और नाम देते हैं चंद्र शेखर ।
उनका ये रूप देख मैना देवी हतप्रभ रह जाती हैं अपनी भूल की माफ़ी मांगती हैं और विवाह कराने को  राजी हो जाती हैं।
शंखनाद के बीच ब्रह्मा जी विवाह संपन्न कराते हैं। चारो और हर्षोल्लास मनाया जाता है और फूलों से वर्षा होती है।
हर हर महादेव । महाशिव रात्रि की शुभ कामनाएं ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सेहर

चिंकी ब्यूटी पार्लर